Never give up and give your best

Never give up
Story of a aspirant
सिविल सेवा की तैयारी के दौरान जीवन में कुछ ऐसी नकारात्मक बातें घटित हो जाती हैं जो स्थाई प्रेरणा की वजह बन जाती हैं और आपको किसी प्रेरक किताब वीडियो और अन्य प्रेरक स्रोत की जरुरत नहीं पड़ती। एक मित्र से जुड़ा हुआ ऐसा प्रसंग है जिससे शायद आप इस बात को समझ पायें और कभी कुछ ऐसा आपके जीवन में घटित हुआ हो तो मिलान कर अपनी प्रतिबद्धता को और मजबूत कर सकें।
एक मित्र जिनका चयन इस बार समीक्षाधिकारी के पद पर हुआ है उन्होंने शेयर किया।

संघर्ष करते-करते एक लंबा वक़्त गुजर गया था। IAS और PCS के बहुत सारे मेंस लिखे मगर आगे कोई राह बनती नजर नहीं आती थी। लगता था जैसे जीवन जड़ हो गया है। कोई बदलाव और प्रगति दूर-दूर तक नजर नहीं आती थी। उम्र 30 के पार 35 करीब चली गयी । घर-परिवार-बीवी-बच्चे तमाम जिम्मेदारियां सर पर बढ़ती गयी और् रोजी-रोटी शून्य की दशा में थी। इस बीच तमाम मित्र अपनी ऊंचाइयों को छू गए। कुछ IAS कुछ PCS कुछ अन्य सम्मानित स्थानों पर अपना जीवन जीने लगे थे। यह बहुत सवाभाविक है कि जब हम बार-बार मेंस लिखने लगते हैं तो कुछ बहुत अच्छे अभ्यर्थी मित्रों के साथ उठना-बैठना हो जाता है जो चयनित होकर ऊँचे पदों पर आसीन हो जाते हैं।

इसी बीच UP में लेखपालों की भर्ती आयी। मैंने अपनी तमाम मुरादों के साथ समझौता कर लिया।।मैं लेखपाल बन गया। लेखपाली के दौरान एक दिन एक बहुत सामान्य सा वाकया पेश आया जिसने मेरी मरती हुई जिजीविषा को झंकृत कर दिया। उसी तहसील में एक नए एसडीएम साहब पोस्ट हुए। बिलकुल फ्रेश बैच। रवायत के मुताबिक उन्होंने लेखपालों की बैठक आहूत की। सबका परिचय देने की औपचारिकता के दौरान मेरी बारी आई। एसडीएम साहब ने मेरे बोलने से पहले थोड़ा सोच की मुद्रा में कहा,
“मुझे लगता है, मैंने देखा हैं आपको। शायद हम पहले से परिचित हैं।”
“हाँ, मुझे भी ऐसा ही लग रहा। ” मैंने धीमी आवाज कहा।
“ओह ! याद आया ! राम प्रवेश ! ” विस्मय भरे बोल निकल पड़े।
मैं चुप रहा बहुत शांत रहा और एक क्षणको दिमाग से वो सब गुजर गया जब एक ही दूकान पर इलाहाबाद में चाय आदि का दौर था। मेंस देकर लौटते तो तमाम चर्चाएं होती।
खैर, मैंने सामान्य तौर पर अपना परिचय पूरा किया। मीटिंग कुछ देर बाद ओवर हो गयी।

यह संयोग था जो मुझे विवश करता रहा अपनी हारी हुई हिम्मत को बटोर लेने को, तमाम झंझावातों के बीच भी उम्मीद की लौ लिए आगे बढ़ने को और विफलता-दर-विफलता कोशिश जारी रखने को। अब एक सम्मानजनक चयन के बावजूद मेरा हौसला बरकरार है तो उम्मीद अभी भी करता हूँ कि एक वाजिब मुकाम हाशिल कर लूंगा।

मैं कहता हूँ, अपना सर्वस्व दाव पर लगाकर समरभूमि में कूदे हुए वीर लड़ाकों ! आप अपनी तमाम हारी हुई मुहिमों को दरकिनार करिये। एक बड़ी लड़ाई के दौर में ऐसे मौके आपके जीवन में न आये तो बेहतर। आ ही जाएँ तो इन्हें असलहा-बारूद बनाइये और पूरी कूवत के साथ काम पर लग जाइए। एक दिन आपका झंडा बहुत बुलंद रहेगा।
शुक्रिया वक़्त देकर पोस्ट पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए।

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